संदेश

अगस्त, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मानसून और मेंढ़क

चित्र
मानसून का महीना तो चल ही रहा , ऐसे में मेढ़कों का निकलना, उनका टर्राना स्वाभाविक बात हैं । भाई, लॉकडाउन लगा और फासिस्ट सरकार ने अभिव्यक्ति पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं । गाहे बगाहे एक आध जो आर्टिकल छपते थे, वह भी आजकल फेसबुक या फलाना - ढिमकना लाइव शो के माध्यम से काम चलाना पड़ रहा है । जिस तरह मेढ़कों की कई प्रजातियां होती हैं, कुछ छोटे, कुछ मझोले और कुछ बड़े आकार के, उसमें भी कोई कम उछलने वाला, कोई लम्बी छलांग मारने वाला, ठीक उसी प्रकार से इन मेढ़कों का भी हाल है । कुछ लम्बा फेंकते हैं तो कुछ औक़ातनुसार छोटा ही फेंकते हैं । कई बार तो इतना दम लगाकर फेंकते हैं कि उनका दम ही उखड़ जाता हैं । फेंकते समय उन्हें न्यूटन बाबा के ग्रेविटी वाले खोज का भी स्मरण नहीं होता, और अपने को एकदम अलग प्रकार के मेंढक समझ कर सुपरहीरो वाली फिलिंग के साथ आसमान पर थूकते हैं । आजकल यह चलन कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया हैं । ऐसे समय में जब सारे के सारे मेंढ़क अपने कन्दराओं में एक महीने का अज्ञातवास बिताने के बाद बाहर निकले तो इतना टर्राए कि जो तुलसीदास ने लिखा था "दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई" अगर वह आज जिंदा होते तो अवश्य ल...