कारवाँ बनता गया
भा रतीय नाटक सिद्धांत अत्यंत समृद्ध और सुविकसित है। नाट्य सिद्धांत पर पुस्तकें भरतमुनि से बहुत पहले से उपयोग की जाती रही हैं। भरतमुनि के पूर्ववर्ती नाट्याचार्यों का कोई ग्रन्थ अभी तलक उपलब्ध नहीं है। कुछ किताबों में कुछ लोगों के उद्धरण मिले , जिनमें कुछ नाटकों के नाम का जिक्र है। लेकिन आज हमारे पास जो कुछ भी है वह काफी नहीं है। भरत के ‘नाट्यशास्त्र’ में नाटक से संबंधित विभिन्न विषयों का व्यापक वर्णन मिलता है , जो शायद किसी अन्य ग्रंथ में नहीं मिलता। यह पुस्तक कई शास्त्रों का आधार लेती है और विभिन्न कलाओं की चर्चा करती है। यह प्राचीन भारतीय ज्ञान का विशाल भण्डार है। यह पुस्तक बाद के सभी नाटककारों की अग्रदूत रही है। अभिनवगुप्त नाट्यशास्त्र के व्याख्याकारों में सबसे प्रसिद्ध हैं , जिन्होंने ‘अभिनव-भारती’ में ‘नाट्यशास्त्र’ की विस्तृत और विद्वतापूर्ण व्याख्या की। अभिनवगुप्त टीकाकार होते हुए भी रंगमंच के संबंध में स्वतंत्रता और मौलिकता के अपने सिद्धांतों को सामने लाते हैं। वस्तुत: अभिनवगुप्त का भारतीय रंगमंच सिद्ध...