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बालमन

  बालमन  बाल साहित्य के विकास में बाधक तत्व विशाल भारत देश में बाल साहित्य हमेशा विभिन्न समस्याओं से जूझता रहा है। प्रौढ़ साहित्य की तुलना में बाल साहित्य कम ही लिखा जा रहा है, क्योंकि इसकी पूछताछ करनेवालों, खोज खबर लेनेवालों की कमी हमेशा रही है। कोई बाल साहित्यकार यदि अपनी कोई कृति लेकर मुद्रण कराने की दृष्टि से किसी मुद्रक और प्रकाशक के पास जाता है तो वह भी उसे लौटा देता है। इसका कारण बाल साहित्य के पाठकों का अभाव है। यदि किसी पुस्तक की अधिक बिक्री की सम्भावना होती है, तो ही प्रकाशक उसे प्रकाशित करने को तैयार होते हैं। मुद्रण की समस्या भारत में मुद्रण कला का प्रारम्भ अठारहवीं शती के बाद प्रारम्भ हुआ है। प्रारम्भ होने पर भी लम्बे समय तक साफ सुथरे और आकर्षक मुद्रण का अभाव रहा है। बच्चे सुन्दर, रंग बिरंगे चित्रोंवाली पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं को अधिक पसंद करते हैं। सामान्य कोटि की बाल साहित्य की पुस्तकों को बच्चे नहीं देखते। बच्चे चित्रोंवाली पुस्तकें ही अधिक उत्सुक होकर देखते हैं। भारत में मुद्रण सम्बन्धी समस्याओं के सम्बन्ध में हरिकृष्ण देवसरे ने इस प्रकार लिखा है- "भारत...

आस्था से अनास्था तक

नास्तिक क्यों हूं। यह 48 पेजों की एक लघु पुस्तिका है। जो ई.वी. पेरियार और भीमराव अंबेडकर द्वारा संपादित है। इसमें भगत सिंह के तीन लेख तथा बी. आर. अंबेडकर व ई. वी. पेरियार के संपादित दो लेखों का संग्रह है। यह पुस्तक क्रमशः पांच अध्याय में विभाजित है, जो क्रमशः मैं नास्तिक क्यों हूं? विद्यार्थी और राजनीति, नौजवान भारत और लाहौर का घोषणा पत्र, तीन शहीद (जनता अखबार में बी. आर. अंबेडकर की संपादकीय) ई. वी. रामास्वामी पेरियार द्वारा संपादित तमिल से अंग्रेजी अनुवाद (पत्रिका कुदी अरासु में 29 मार्च 1931 में प्रकाशित संपादकीय) आजादी से पूर्व अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांतिकारी कामों के परिणाम स्वरूप मात्र 23 साल की उम्र में हुई फांसी की सजा ने भगत सिंह को एक सामान्य क्रांतिकारी से शहीद-ए-आजम बना दिया। किंतु विचारणीय बात तो यह है कि बचपन से आस्तिक व एक कट्टर आर्य समाजी परिवार से होने के बाद भी किस तरह वह नास्तिकता की विचारधारा की ओर प्रवाहित हो गए। निश्चय ही ये कोई एक दिन की प्रक्रिया नहीं रही होगी। ये पुस्तक आपको बताती है कि लाहौर के सेंट्रल जेल में स्वतंत्रता सेनानी बाबा रणजीत सिंह और भगत सिंह ...

21 वीं शताब्दी, गांधीवाद और भवानी प्रसाद मिश्र की कविताएं

21वीं शताब्दी का समय भागदौड़ का समय है, जो ठहरने की फुरसत नहीं देता है, पर - हित के लिए सोचने और समझने के लिए समय निकालने को लोग जरूरी नहीं समझते हैं। एक तरफ दिन प्रतिदिन हम तकनीकी रूप से आधुनिक हो रहे हैं तो दूसरी ओर हमारी प्रकृति बिखर रही है,सामाजिकता जटिल हो रही है।हर तरफ किसी न किसी रूप में भय और संशय की व्याप्ति है। सबों को कोई न कोई डर सता रहा है। इस एवज में भविष्य के बारे में सोचने पर सब कुछ रिक्त दिखाई देता है। वहीं दूसरी तरफ जब सबों के लिए मंगल सोचा जाता है, तभी सुंदर भविष्य दिखता है। आज की सभ्यता और समाज के लिए के लिए अपने हित से पहले दूसरों के हित को जानना, समझना और आत्मसात करना अत्यंत जरूरी हो गया है।इस एवज में भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में महावीर,गौतम बुद्ध से लेकर महात्मा गांधी जैसे बड़े - बड़े नाम हैं,जो दुनिया को जीवनशैली देते हैं, सोचने का एक 'पैटर्न' देते हैं, जीने का तरीका देते हैं। गांधी आधुनिक समय में पूरी दुनिया के सबसे प्रभावी लोगों में से एक हैं,उनका प्रभाव राजनीति, समाज,अर्थ जगत के साथ साथ साहित्य और कला के हर विधा में है। गांधी जी राजनीति की भाषा में मा...

मीरा का काव्य: स्त्री जीवन के बंधनों का दस्तावेज

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  भारतीय साहित्य के इतिहास भक्ति आंदोलन के साथ पहली बार कविता के क्षेत्र में सशक्त स्त्री स्वर सुनाई पड़ता है। हिंदी में मीरा का वही स्थान है जो तमिल में अंडाल का, कन्नड़ में एक अक्कमहादेवी का, कश्मीर में ललय का और मराठी में बहिणाबाई और मुक्ताबाई का। मीरा की कविता में स्त्री की आत्मा की ऐसी आवाज है जो पराधीनता के बोध से बेचैन और स्वाधीनतना की आकांक्षा से प्रेरित स्त्री की आवाज है। वस्तुतः हिंदी,राजस्थानी और गुजराती तीनों की त्रिवेणी में नहाई हुई मीरा की कविता नारी चेतना की सशक्त दस्तावेज है।       अपनी सामाजिक अस्मिता को त्यागकर व्यक्तिगत अस्मिता को आधार बनाकर यदि किसी भक्त ने भक्त रूप में विशेष ख्याति प्राप्त की है तो वह भक्त कवयित्री मीरा ही है,उनके काम में भक्ति, विरह व विद्रोह का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यहां एक तरफ 'माधुर्य भक्ति' भी दिखता है तो दूसरी तरफ समाज के नकारात्मक रौद्र रूप, सामंती व्यवस्था, पुरुष सत्ता आदि के प्रति तीखा विरोध का स्वर भी सुनाई पड़ता है।    "मीरा के माध्यम से मध्यकालीन समाज में घुटती-  कराहती, नाना प्रकार के सामाज...

हिंदी नाटकों के विकास में भारतेंदु हरिश्चंद्र का योगदान

  हिंदी नाटकों के विकास में भारतेंदु हरिश्चंद्र का योगदान राजकुमारी सेठ शोध छात्रा हिंदी और अन्य भारतीय भाषा विभाग महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ , वाराणसी   हिंदी साहित्य में आधुनिक युग के सूत्रपात का श्रेय जिस महापुरुष को जाता है , वह हैं भारतेंदु हरिश्चंद्र। हिंदी नाट्य साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान अमूल्य है , जिसने हिंदी नाटकों को एक नई दिशा दी। भारतेंदु ने हिंदी नाटक विधा को न केवल जीवंतता प्रदान की , बल्कि उसे सामाजिक , राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना से भी जोड़ा। उनका नाट्य साहित्य तत्कालीन सामाजिक समस्याओं , राजनीतिक दमन और सांस्कृतिक जड़ता को उजागर करता है। यह शोध पत्र हिंदी नाटकों के विकास में भारतेंदु हरिश्चंद्र के योगदान का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करेगा। भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को वाराणसी में एक समृद्ध परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम हरिश्चंद्र था , लेकिन हिंदी साहित्य में दिए गए उनके योगदान के कारण उन्हें "भारतेंदु" की उपाधि दी गई , जिसका अर्थ है "भारत का चंद्रमा"। बाल्यकाल से ही उनका साहित्यिक अभिरुचि की ओर झुकाव था और...

हिंदी नाटकों के विकास में हबीब तनवीर के नाटकों का योगदान

हिंदी नाटकों के विकास में हबीब तनवीर के नाटकों का योगदान राजकुमारी सेठ शोध छात्रा हिंदी और अन्य भारतीय भाषा विभाग महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ , वाराणसी हिंदी नाटक साहित्य के विकास में हबीब तनवीर का योगदान महत्वपूर्ण और असाधारण रहा है। वह एक ऐसे नाटककार थे जिन्होंने न केवल भारतीय रंगमंच को एक नई पहचान दी , बल्कि उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता दिलाई। हबीब तनवीर का नाम भारतीय रंगमंच की दुनिया में एक ऐसे व्यक्ति के रूप में लिया जाता है , जिन्होंने परंपरागत और लोक कला के साथ आधुनिकता का संगम कर एक अनूठी शैली का विकास किया। उनके नाटकों ने न केवल दर्शकों को मनोरंजन प्रदान किया , बल्कि समाज के गंभीर मुद्दों को भी प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। इस शोध पत्र का उद्देश्य हबीब तनवीर के नाटकों के योगदान को समझना और हिंदी नाटकों के विकास में उनके महत्व को रेखांकित करना है। यह पत्र हबीब तनवीर के जीवन , उनके नाटकों की विशिष्टता , उनके द्वारा अपनाई गई शैली , और उनके द्वारा हिंदी रंगमंच में किए गए नवाचारों पर विस्तार से चर्चा करेगा। हबीब तनवीर का जीवन और परिचय: हबीब तनवीर का जन्म ...