राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन को मेरा ख़त
आदरणीय पुरुषोत्तम दास टण्डन जी सादर प्रणाम हमलोग यहाँ कुशल हैं, आशा करता हूँ कि आप जहाँ भी होंगे कुशल होंगे । यह पत्र आपको एक बात बताने के लिए लिख रहा हूँ । आपने जो "बंदर सभा" नाम से जो कविता 'हिंदी प्रदीप' में लिखी थी, वह तो अपने अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लिखी थी, लेकिन देखिये न अब आपका बंदर स्वदेशी हो गया है । मदारी का यह बंदर पता नहीं कब अपने मदारी के पास से भाग गया और अपनी एक फौज बना ली है । इस बंदरों के फौज का मुख्य काम जानते हैं । इनका काम है , सबको बंदर बनाने की कोशिश करना । दुःख की बात यह नहीं कि ये बंदर बना रहे, जिसको बनना है बने, लेकिन दुःख इससे होता है कि जो बंदर नहीं बनता उनको यह लोग दाँत काट लेते है । बताइये ऐसा कौन करता है ? आपका बंदर तो विदेशी था इसलिए यहाँ के लोगों का दुःख दर्द नहीं समझता था और उनके रक्त, माँस पर अपना अधिकार समझता था लेकिन देशी बंदर तो दिखावा करता है कि वह आपके दुःख को समझ रहा है, फिर भी रक्त और माँस की इसको आदत लग गई है । अब आप ही बताइये, हमलोग क्या करें ..? ...