हिंदी नाटकों के विकास में भारतेंदु हरिश्चंद्र का योगदान
हिंदी नाटकों के विकास में भारतेंदु हरिश्चंद्र का योगदान
राजकुमारी सेठ
शोध छात्रा
हिंदी और अन्य भारतीय भाषा विभाग
महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी
हिंदी साहित्य में आधुनिक युग के सूत्रपात का श्रेय जिस
महापुरुष को जाता है, वह हैं
भारतेंदु हरिश्चंद्र। हिंदी नाट्य साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान अमूल्य है, जिसने हिंदी नाटकों को एक नई दिशा दी। भारतेंदु ने हिंदी
नाटक विधा को न केवल जीवंतता प्रदान की, बल्कि उसे सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना से भी जोड़ा। उनका नाट्य
साहित्य तत्कालीन सामाजिक समस्याओं, राजनीतिक दमन और सांस्कृतिक जड़ता को उजागर करता है। यह शोध
पत्र हिंदी नाटकों के विकास में भारतेंदु हरिश्चंद्र के योगदान का विस्तृत विवेचन
प्रस्तुत करेगा।
भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को वाराणसी में एक समृद्ध परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम
हरिश्चंद्र था, लेकिन हिंदी साहित्य
में दिए गए उनके योगदान के कारण उन्हें "भारतेंदु" की उपाधि दी गई, जिसका अर्थ है "भारत का चंद्रमा"। बाल्यकाल से ही
उनका साहित्यिक अभिरुचि की ओर झुकाव था और उन्होंने हिंदी भाषा के उत्थान के लिए
अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा समर्पित किया। उनके साहित्यिक कार्यकाल में कविता, नाटक, उपन्यास, लेख, निबंध और
अनुवाद कार्यों का समृद्ध संग्रह है। उनके नाटकों का विशेष महत्व इसलिए भी है
क्योंकि उन्होंने हिंदी नाटक को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक सुधार का एक सशक्त साधन बनाया।
भारतेंदु के पूर्व हिंदी नाटकों का स्वरूप अत्यधिक सीमित
था। अधिकांश नाटक संस्कृत, फारसी या
बंगाली भाषा से प्रेरित थे और हिंदी में मौलिक नाट्य लेखन का अभाव था। उस समय के
नाटक धार्मिक कथाओं पर आधारित होते थे और इनमें मनोरंजन का अभाव था। हिंदी में
मौलिक और आधुनिक नाटक की आवश्यकता थी, जो समाज की समस्याओं, जनता की भावनाओं और राजनीतिक परिस्थितियों को उजागर कर सके।
इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपने नाटकों की रचना
की।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी नाटकों को नए आयाम दिए। उनके
नाटक तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक
और सांस्कृतिक परिस्थितियों को उजागर करने वाले थे। उन्होंने नाटक को केवल मनोरंजन
का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि
उसे समाज सुधार और जनचेतना का सशक्त माध्यम बना दिया। उनके प्रमुख नाटकों में
निम्नलिखित शामिल हैं:
1. 'सत्य
हरिश्चंद्र' (1875): यह नाटक भारतेंदु का सबसे प्रसिद्ध नाटक है, जो राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा और नैतिकता पर आधारित है।
यह नाटक सामाजिक और धार्मिक आदर्शों को केंद्र में रखता है। भारतेंदु ने इस नाटक
के माध्यम से समाज में नैतिकता, सत्य
और धार्मिकता के महत्व को उजागर किया। यह नाटक सामाजिक सुधार की दिशा में एक
महत्त्वपूर्ण कदम था, क्योंकि
उस समय समाज में नैतिक पतन और भ्रष्टाचार का बोलबाला था।
2. 'भारत
दुर्दशा' (1875): यह नाटक भारतेंदु के राजनीतिक दृष्टिकोण को प्रकट करता है।
इसमें उन्होंने ब्रिटिश उपनिवेशवाद के कारण भारतीय समाज की दुर्दशा का चित्रण किया
है। नाटक में भारत को एक बंधनग्रस्त राष्ट्र के रूप में दिखाया गया है, जहाँ जनता विदेशी शासन के अधीन पीड़ित और असहाय है। इस नाटक
ने लोगों में स्वतंत्रता की भावना जगाई और ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष को बढ़ावा
दिया।
रोवहु सब मिलि के आवहु भारत भाई।
हा! हा! भारत दुर्दशा न देखी जाई॥
इस
उद्धरण से भारतेंदु ने ब्रिटिश शासन के प्रति अपनी तीव्र असहमति और भारत की दयनीय
स्थिति को उजागर किया है।
3. 'अंधेर
नगरी' (1878): यह नाटक भारतेंदु का एक और प्रसिद्ध व्यंग्यात्मक नाटक है।
इसमें उन्होंने भ्रष्टाचार, अन्याय
और प्रशासनिक अराजकता को तीव्रता से उजागर किया है। नाटक में एक अंधेर नगरी का
चित्रण है, जहाँ सबकुछ
अव्यवस्थित और अराजक है। राजा के निरंकुश शासन और समाज में व्याप्त अन्याय को
दिखाकर भारतेंदु ने सामाजिक सुधार की आवश्यकता पर बल दिया।
“अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा।”
इस
उद्धरण के माध्यम से भारतेंदु ने उस समय के प्रशासनिक भ्रष्टाचार और अव्यवस्था को
सजीव रूप में प्रस्तुत किया है। यह नाटक आज भी प्रासंगिक है और भारत में व्याप्त
भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं की ओर इशारा करता है।
4. 'नील देवी'
(1881): इस नाटक में भारतेंदु ने
भारत के गौरवशाली अतीत का चित्रण किया है। नील देवी वीरता और साहस की प्रतीक हैं, जिन्होंने अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। इस नाटक के
माध्यम से भारतेंदु ने महिलाओं की शक्ति और साहस को उजागर किया और समाज में
महिलाओं की भूमिका को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया।
नाटक और सामाजिक सुधार
भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटकों में समाज सुधार की गहरी
भावना परिलक्षित होती है। उनके नाटकों का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि वे समाज में व्याप्त कुरीतियों और बुराइयों को उजागर
करना चाहते थे। उनके नाटकों में समाज सुधार की झलक निम्नलिखित पहलुओं में दिखाई
देती है:
1. जाति और वर्ग भेदभाव:
भारतेंदु ने समाज में व्याप्त जाति और वर्ग भेदभाव पर तीखा
प्रहार किया। उनके नाटकों में समाज के उच्च वर्ग के पाखंड और निम्न वर्ग की
समस्याओं को उजागर किया गया है। उन्होंने नाटक के माध्यम से इस भेदभाव के खिलाफ
आवाज उठाई और समानता और न्याय की बात की।
2. नारी सशक्तिकरण:
भारतेंदु के नाटकों में नारी सशक्तिकरण की भावना भी स्पष्ट
दिखाई देती है। उस समय महिलाओं की स्थिति समाज में अत्यंत दयनीय थी। भारतेंदु ने
अपने नाटकों में महिलाओं को न केवल सहानुभूति का पात्र बनाया, बल्कि उन्हें समाज में सम्मान और अधिकार दिलाने का प्रयास
किया। नील देवी और अन्य नाटकों में उन्होंने महिलाओं के संघर्ष और साहस का चित्रण
किया।
3. शिक्षा और चेतना:
भारतेंदु के नाटकों का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य शिक्षा और
जनचेतना का प्रसार करना था। उनके नाटक समाज में जागरूकता लाने का काम करते थे।
उन्होंने अपने नाटकों में अज्ञानता, अंधविश्वास और अशिक्षा के खिलाफ संघर्ष किया और समाज को
शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूक किया।
4. देशभक्ति और राष्ट्रीयता:
भारतेंदु हरिश्चंद्र का नाट्य साहित्य राष्ट्रीय चेतना से
परिपूर्ण था। उनके नाटकों में भारत के गौरवशाली इतिहास, स्वतंत्रता के प्रति प्रेम और विदेशी शासन के प्रति असंतोष
की भावना को अभिव्यक्त किया गया है। उन्होंने ब्रिटिश शासन के अत्याचारों को उजागर
किया और भारतीय जनता को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया।
भाषा और शैली में नवीनता
भारतेंदु ने हिंदी नाटकों में भाषा और शैली की दृष्टि से भी
महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने हिंदी भाषा को सरल, सजीव और जनसामान्य की भाषा के रूप में प्रस्तुत किया। उनकी
भाषा में संस्कृतनिष्ठता होते हुए भी वह कठिन नहीं थी। भारतेंदु ने लोकभाषाओं, आंचलिक बोलियों और प्रचलित मुहावरों का भी प्रयोग किया, जिससे उनके नाटक सरल और प्रभावशाली बने। इसके अलावा, भारतेंदु ने नाट्य लेखन में यथार्थवाद को महत्व दिया, जिससे उनके पात्र और घटनाएँ सजीव और यथार्थवादी प्रतीत होती
हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटकों में भाषा का प्रयोग विशेष
रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने हिंदी में व्यंग्य,
हास्य और गंभीरता का अद्भुत संतुलन बनाया। उदाहरण के लिए, उनके नाटक "सत्य हरिश्चंद्र" में उन्होंने हिंदी को धार्मिक और
नैतिकता के संदर्भ में प्रस्तुत किया है। यहाँ उन्होंने न केवल संस्कृतनिष्ठ
शब्दों का उपयोग किया, बल्कि सरल बोलचाल की भाषा में संवादों
को लिखा, जिससे यह नाटक आम जनता को समझ में आ सके। उनके
संवादों में स्पष्टता और संप्रेषणीयता है, जिससे दर्शकों को
पात्रों की भावनाओं और विचारों का एहसास होता है।
उनकी रचनाएँ न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थीं, बल्कि उन्होंने हिंदी भाषा के विभिन्न
रूपों को भी समाहित किया। भारतेंदु ने अपनी नाटकों में कई स्थानीय बोलियों और
मुहावरों का प्रयोग किया, जो हिंदी भाषा को विविधता प्रदान
करता है। उनके नाटकों में भोजपुरी, अवधी और अन्य क्षेत्रीय
भाषाओं का समावेश है, जिसने हिंदी को और भी समृद्ध बनाया।
उदाहरण के लिए, नाटक "अंधेर नगरी" में उन्होंने
लोकजीवन और उसकी समस्याओं को चित्रित किया है, जिसमें आम
जनता की भाषा का प्रयोग हुआ है। इससे न केवल भाषा की समृद्धि बढ़ी, बल्कि आम लोगों की समस्याओं को भी दर्शाया गया।
भारतेंदु के नाटकों में व्यंग्य का भी महत्वपूर्ण स्थान है।
उन्होंने अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक
और धार्मिक कुरीतियों पर तीखा व्यंग्य किया, जिससे हिंदी
भाषा को एक नया संदर्भ मिला। उनके नाटक "भारत दुर्दशा" में उन्होंने
ब्रिटिश उपनिवेशवाद के प्रति अपनी कड़ी आलोचना की है, जो न
केवल हिंदी भाषा की सामाजिक भूमिका को उजागर करता है, बल्कि
उसे एक राजनीतिक माध्यम भी बनाता है। इस नाटक के माध्यम से उन्होंने हिंदी को एक
सशक्त राजनीतिक आवाज के रूप में स्थापित किया।
भारतेंदु हरिश्चंद्र का एक और महत्वपूर्ण योगदान हिंदी भाषा
को अद्यतन करने का है। उन्होंने पुराने शब्दों के स्थान पर नए और प्रचलित शब्दों
का प्रयोग किया, जिससे हिंदी नाटक और
पाठकों के बीच की दूरी कम हुई। उन्होंने न केवल साहित्यिक भाषा को सरल बनाया,
बल्कि उसमें आधुनिकता और प्रासंगिकता भी जोड़ी। उनके नाटकों में नई
शब्दावली का समावेश हिंदी को समृद्ध करता है और उसे समय के साथ प्रासंगिक बनाता
है।
उनकी रचनाएँ यह दर्शाती हैं कि उन्होंने नाटक को केवल
मनोरंजन का साधन नहीं माना, बल्कि उसे
समाज के प्रति एक उत्तरदायित्व के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने हिंदी को एक
ऐसा माध्यम बनाया, जिसके द्वारा समाज की समस्याओं को उठाया
जा सके और लोगों को जागरूक किया जा सके। उनके नाटक सामाजिक चेतना का संचार करते
हैं और वे लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करते हैं।
अंततः, भारतेंदु
हरिश्चंद्र के नाटकों ने हिंदी भाषा को एक नई पहचान और दिशा दी। उनकी भाषा की
सरलता, विविधता, और प्रासंगिकता ने न
केवल हिंदी नाटकों की नींव रखी, बल्कि उसे एक सशक्त
साहित्यिक रूप में स्थापित किया। उनके कार्यों ने यह साबित किया कि हिंदी भाषा में
सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संवाद की क्षमता है। इसलिए,
भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिंदी नाटकों के विकास में एक महत्वपूर्ण
स्थान प्राप्त है, और उनके योगदान को सदैव याद रखा जाएगा।
भारतेंदु के नाटकों की विषयवस्तु और उनके प्रभाव
1. व्यंग्य और आलोचना:
भारतेंदु के नाटकों में व्यंग्य और आलोचना का प्रमुख स्थान
है। उन्होंने अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक कुरीतियों पर तीखा व्यंग्य किया और
समाज को सुधारने का संदेश दिया। "अंधेर नगरी" जैसे नाटक व्यंग्य के
बेहतरीन उदाहरण हैं, जिसमें
शासन-प्रशासन की अराजकता और भ्रष्टाचार पर कटाक्ष किया गया है।
2. सामाजिक जागरूकता:
उनके नाटकों में समाज में व्याप्त अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार, जाति-प्रथा, धार्मिक पाखंड, और महिलाओं की दुर्दशा को प्रमुखता से उजागर किया गया। उनके
नाटक केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं थे, बल्कि समाज सुधार और चेतना जागरण का उद्देश्य रखते थे।
3. प्रेम और पारिवारिक मूल्य:
भारतेंदु के नाटकों में प्रेम और पारिवारिक मूल्यों का भी
महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने अपने पात्रों के माध्यम से प्रेम, त्याग, और
आदर्श परिवार के महत्व को दर्शाया। उनके नाटकों में आदर्शवादी प्रेम, परिवार के प्रति निष्ठा और सामाजिक मूल्यों की गहरी झलक
मिलती है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी नाटकों को एक नई दिशा और
पहचान दी। उनके नाटकों ने सामाजिक, राजनीतिक, और
सांस्कृतिक चेतना को जागृत किया। उन्होंने हिंदी नाटकों को केवल मनोरंजन का साधन
नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सामाजिक
सुधार और जागरूकता का सशक्त माध्यम बनाया। उनके नाट्य लेखन ने हिंदी साहित्य को एक
नई दिशा दी और आज भी उनके नाटक प्रासंगिक और प्रेरणादायक बने हुए हैं।
भारतेंदु
हरिश्चंद्र का नाट्य साहित्य हिंदी साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय
है। उन्होंने न केवल हिंदी नाटकों की नींव रखी, बल्कि समाज में व्याप्त कुरीतियों और अन्याय के खिलाफ अपनी
आवाज उठाई। उनका योगदान हिंदी नाटकों के विकास में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है, और वे सही मायनों में हिंदी नाटक के जनक के रूप में स्मरणीय हैं।
सन्दर्भ ग्रन्थ
सूची
1.
बच्चन
सिंह, हिन्दी नाटक,
2.
प्रो.
रामजन्म शर्मा, स्वतंत्र्योत्तर हिन्दी नाटक :
वस्तु और शिल्प
3.
डॉ.
दशरथ ओझा, आज का हिन्दी नाटक : प्रगति और प्रभाव
4.
हिन्दी नाट्य विमर्श, डॉ. सदानन्द भोसले (2017) विकास प्रकाशन, कानपुर।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें